Monday, 11 April 2016

: : : : : गुजरा जमाना : : : : : : : : :

वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी
वो छोटी नदी की उफनती जवानी
टील्हों से कूद कर छपाके लगाना
मित्रों के संग उसमें कूदके नहाना

कभी मछली पकड़ना या साँपों से भीड़ना
नदी - धार के साथ दूर दूर तक चलना
हो कीचड़ में लथ - पथ , डरना - डराना
फिर मस्ती में झूम कर , हँसना - हँसाना

पेड़ों पर चढ़ कर डाल - डाल फुदकना
डोल - पता के खेल में धरती पे कूदना
अमरूद की डाली से फल खाना - खिलाना
अंकल को देख कर , " बाप रे " चिल्लाना

माँ की गोद आ दुबक , चेहरा छिपाना
और बला के टल जाते ही , किस्सा दुहराना
होम वर्क निपटा कर , नदी भाग जाना
फिर मित्रों के संग उसमें घंटों नहाना

शरारती छोरो में औव्वल गिनवाना
पर माँ की नजरों में सुशील बन के रहना
बाहर में खेला और तमाशा था करना
घर में शांत , मौनी बाबा बन के रहना

कितना था सुन्दर , कितना सुहाना
दिन - रात माँ के ही हाँथों से खाना
था देवी का रुप माँ में जाना - पहचांना
भगवन ! लौटा दे वो मेरा गुज़रा जमाना

भगवन लौटा दे - - - - - - - - - - -- - - - -
G N Pd - - 12 - 4 - 2016

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